नई दिल्ली जाने-माने इतिहासकार विक्रम संपत ने कांग्रेस को जमकर सुनाया है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर की मौजूदगी में संपत ने देश की सबसे पुरानी पार्टी पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने हमलावरों की वीरगाथा लिखने वाले वामंथियों को बढ़ावा दिया। उन्होंने भारतीय इतिहास को काफी तोड़-मरोड़ कर लिखा। यह सही तस्वीर पेश नहीं करता है। मौका था इंडिया टुडे कॉनक्लेव का। यहां संपत के साथ एक ही मंच पर शशि थरूर भी मौजूद थे। जब संपत से पूछा गया कि भारतीय अपनी पहचान संविधान से करते हैं या फिर उनकी पहचान धर्म से है तो उन्होंने इसका विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने जवाब देने से पहले ही साफ कर दिया कि वह राजनीतिक नहीं, बल्कि इतिहासकार के तौर पर अपना नजरिया पेश कर रहे हैं। सोच में अंग्रेजियत की छाप संपत ने कहा कि हम बेशक राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र हो गए। लेकिन, हमारी सोच उपनिवेशवाद के दौर से बाहर नहीं निकल पाई। पूरी शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजियत हावी रही है। शिक्षा की भूमिका बहुभाषियों को पैदा करने की रही है। हमारें विचारों पर भी इसी अंग्रेजी की छाप दिखती है। यही नजरिया इतिहास को लिखने में रहा है। संपत बोले कि बच्चे जब इतिहास से मुखातिब होते हैं तो लगता है किसी और देश की हिस्ट्री से रूबरू हैं। ब्रिटिश हुकूमत के सबसे बुरे दौर में भी राष्ट्रवादी इतिहासकारों को स्थान मिला। इनमें जादूनाथ सरकार, आरसी मजूमदार, राधा कुमुद मुखर्जी, वीके रजवाड़े, सीवी वैद्य जैसे नाम शामिल हैं। कांग्रेस ने वामपंथी इतिहासकारों को दी जगहसंपत ने कहा कि हालांकि, दुर्भाग्यवश आजादी के बाद कांग्रेस ने अनजाने में वह स्थान वामपंथी इतिहासकारों को दे दिया। इतिहास ऐसा विषय है जिसमें बहुत से नजरियों विचारों की जरूरत होती है। यह और बात है कि भारत में यह लेफ्टिस्ट इतिहासकारों के हाथों में सिमटकर रह गया। इससे भारतीय इतिहास के साथ काफी खिलवाड़ हुआ। कई गलतियां हुईं। उन्होंने कहा कि वामपंथियों के नजरिये से भारत की कहानी लगता है कि वो आक्रमणकारियों की कहानी है। जो बच्चा इसको पढ़ना शुरू करता है, उसके सामने आक्रमणकारियों की लंबी फेहरिस्त दिखने लगती है। कभी-कभार यह लगता है कि हम पराजित होने वाले देश रहे हैं। जबकि सच यह है कि हमने कई युद्ध जीते हैं। हमने बाहरी आक्रांताओं को बहादुरी के साथ रोका भी है। लेकिन, उसे हल्के-फुल्के अंदाज में लिखकर रफा-दफा किया गया। भारत का इतिहास दिल्ली केंद्रित उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास दिल्ली केंद्रित लगता है। न तो उसमें पल्लव, विजयनगर शासन का बहुत जिक्र है, न चोला, त्रावणकोर और राष्ट्रकूटों का। भारत को अपने इतिहास को दिल्ली से दोबारा हासिल करने की जरूरत है। यह दिल्ली सेंट्रिक नहीं हो सकता है। मध्यकालीन इतिहास को लिखने में कई बुरे पहलुओं को स्वीकारने से मुंह मोड़ लिया गया है। खासतौर से मुस्लिम आक्रमणकारियों के बारे में सही तस्वीर नहीं पेश की गई है। संपत ने एक अमेरिकी इतिहासकार का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने भारत में इस्लामिक इनवेजन को मानव इतिहास में सबसे खूनी आक्रमण करार दिया है। संपत ने सवाल किया कि क्या हमारी इतिहास की किताबों में उसका वैसा ही जिक्र मिलता है जैसा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह डर रहा है कि इससे देश की संप्रभुता पर असर पड़ सकता है। लेकिन, सच को सच की तरह दिखाया जाना चाहिए। इतिहास पुराने समय में जाने और उसे महसूस करने का रास्ता देता है। यह उससे आगे बढ़ जाने के लिए भी कहता है। हालांकि, वैसा नहीं किया गया।
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