पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द प्रेजिडेंशल इयर्स’ पर उनके बेटे और बेटी के बीच एक राय नहीं है। पिछले दिनों दोनों इस फर्क से सुर्खियों में आए। प्रणब बाबू के बेटे और कांग्रेस एमपी रह चुके अभिजीत मुखर्जी किताब का प्रकाशन रोकना चाहते हैं। वहीं पूर्व राष्ट्रपति की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी इसे छपवाना चाहती हैं। भाई-बहन के बीच हुई इस रार के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। अभिजीत और शर्मिष्ठा के बारे में बता रहे हैं एनबीटी के पॉलिटिकल एडिटर नदीम-पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब 'द प्रेजिडेंशल ईयर्स' को लेकर अभिजीत और शर्मिष्ठा मुखर्जी के बीच एक राय नहीं है। अभिजीत किताब का प्रकाशन रोकना चाहते हैं जबकि शर्मिष्ठा छपवाना चाहती हैं। जानिए दोनों के बारे में-

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द प्रेजिडेंशल इयर्स’ पर उनके बेटे और बेटी के बीच एक राय नहीं है। पिछले दिनों दोनों इस फर्क से सुर्खियों में आए। प्रणब बाबू के बेटे और कांग्रेस एमपी रह चुके अभिजीत मुखर्जी किताब का प्रकाशन रोकना चाहते हैं। वहीं पूर्व राष्ट्रपति की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी इसे छपवाना चाहती हैं। भाई-बहन के बीच हुई इस रार के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। अभिजीत और शर्मिष्ठा के बारे में बता रहे हैं एनबीटी के पॉलिटिकल एडिटर
नदीम
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परिवार की विरासत संभाल रहे अभिजीत

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में भले ही उनकी पहचान अभिजीत मुखर्जी के तौर पर होती हो, पर पश्चिम बंगाल में वह ‘बाबू दा’ के नाम से ही प्रसिद्ध हैं। वजह यह कि ‘बाबू दा’ के जरिए अपनेपन का जो अहसास होता है, वह अभिजीत में कहां! ‘बाबू दा’ के पिता के राजनीतिक कद पर किसी तरह की बहस बेईमानी ही होगी, पर उनके कद के ही मद्देनजर अभिजीत को यह फैसला लेने में 26 साल लग गए कि उन्हें राजनीति में आना है या नहीं?
शर्मिष्ठा में है सियासत और कथक का मेल

शर्मिष्ठा मुखर्जी अभिजीत से पांच साल छोटी हैं। बड़े भाई ने अपनी जड़ें अपने होमटाउन से जोड़ रखी हैं, तो शर्मिष्ठा ने दिल्ली को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया है। 2014 में वह पॉलिटिक्स में आईं और अगले ही साल दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बहुत ही एलीट समझे जाने वाले इलाके ग्रेटर कैलाश से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ा। हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। शर्मिष्ठा की पहचान महज एक सियासतदां के तौर पर ही नहीं है। वह अपनी शख्सियत की कई दूसरी तस्वीरों की वजह से भी जानी जाती हैं। वे एक बेहतरीन कथक डांसर और कोरियोग्राफर भी हैं।
बीजेपी में जाने की लगी थीं अटकलें

शर्मिष्ठा ने भारत के बाहर भी अपनी कथक परफॉर्मेंस के जरिए नाम कमाया। 2016 में तब लोगों ने उनकी हिम्मत को सराहा था, जब फेसबुक पर उनके खिलाफ आपत्तिजनक बातें लिखे जाने को उन्होंने बहस का मु्द्दा बनाया। उन्होंने उन आपत्तिजनक संदेशों और भेजने वाले शख्स की प्रोफाइल को शेयर करते हुए लिखा था, ‘मैं इस शख्स को ब्लॉक कर उसे नजरअंदाज कर सकती थी, लेकिन मुझे लगा कि इससे उसे किसी को अगला शिकार बनाने का मौका मिलेगा। इसे रोकने के लिए ऐसे शख्स को एक्सपोज करना बेहद जरूरी है।’
2019 में शर्मिष्ठा को दिल्ली महिला कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया गया। इस वक्त वे कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। बीच में एक वक्त ऐसा भी आया, जब राजनीतिक गलियारों में शर्मिष्ठा के बीजेपी में जाने की अटकलें लगने लगी थीं लेकिन उन्होंने ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से खारिज किया था। हालांकि राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि बीजेपी की नजर उन पर लगातार बनी हुई है।
2019 में टीएमसी उम्मीदवार से हारे

उस समय तक इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि प्रणब दा को सक्रिय राजनीति से हटाकर कांग्रेस राष्ट्रपति बनाने जा रही है। ऐसे में अपने परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए अभिजीत का पॉलिटिक्स में आना जरूरी हो गया था। पहले चुनाव के लिए उन्होंने नालहटी विधानसभा सीट को चुना, जहां 1967 से लेकर 2011 तक वामदल जीतता रहा था। अभिजीत ने वह सीट जीतकर इतिहास बनाया। 2012 में प्रणब दा के राष्ट्रपति बनने के बाद खाली हुई उस लोकसभा सीट के उपचुनाव के जरिए अभिजीत राष्ट्रीय राजनीति में दाखिल हुए। 2014 में भी इसी सीट से जीते लेकिन 2019 में उन्हें टीएमसी उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा।
26 साल तक कॉरपोरेट जगत में नौकरी

1960 में पैदा हुए अभिजीत ने 24 साल की उम्र में जब मकैनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की, तो उनके पिता राष्ट्रीय राजनीति के कद्दावर नेताओं में थे। अभिजीत को यहीं पर फैसला लेना था कि उनका रास्ता क्या हो। हां या न के बीच उन्होंने अपनी जिंदगी के 26 साल कई बड़े कॉरपोरेट घरानों में नौकरी करते हुए गुजार दिए, जिनमें मारुति, भारत हैवी इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया वगैरह हैं। 2011 में जब उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया, तब वह स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के चीफ थे।
50 साल की उम्र में राजनीति में एंट्री

अभिजीत की 2011 में राजनीति में जब एंट्री हुई, तो वह 50 की उम्र पार कर चुके थे। कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि दरअसल प्रणब दा बहुत दूर की सोचते थे। वह अपने बेटे को राजनीति में लाकर अपने ऊपर वंशवाद की कोई तोहमत नहीं लगवाना चाहते थे। अभिजीत भी यह बात कई मौकों पर कह चुके हैं कि उन्हें राजनीति में आना चाहिए या नहीं, इस मसले पर पिता जी ने उनसे कभी कोई बात ही नहीं की। 2011 में राजनीति में एंट्री के फैसले में भी पिता जी की कोई इच्छा या अनिच्छा शामिल नहीं थी।
कथक डांसर के रूप में बनाया खास मुकाम

लेडी इरविन स्कूल, सेंट स्टीफेन कॉलेज जैसे दिल्ली के नामचीन शिक्षण संस्थाओं से उन्होंने पढ़ाई की। पोस्ट ग्रैजुएट उन्होंने जेएनयू से किया है। शर्मिष्ठा जब 10-12 साल की थीं, उन्होंने एक कार्यक्रम में पंडित दुर्गा लाल को परफॉर्म करते देखा। बस यहीं से उनके दिल में भी कथक सीखने का ख्याल आया और वे पंडित दुर्गालाल की शागिर्द बनकर कथक सीखने में जुट गईं। पंडित दुर्गा लाल का जयपुर घराने से ताल्लुक था। वह बड़े प्रतिष्ठित कथक गुरुओं में शुमार किए जाते रहे हैं। उन्हें पद्मश्री भी मिला था। शर्मिष्ठा को उमा शर्मा और पंडित राजेंद्र गंगानी जैसे गुरुओं से भी सीखने का मौका मिला, जिसकी बदौलत उन्होंने खुद कथक डांसर के रूप में खास मुकाम बनाया।
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