केंद्र सरकार और ममता बनर्जी एक बार फिर आमने-सामने हैं। इस बार ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने से इनकार कर दिया है। ऐसा ही कुछ 2001 में भी हुआ था जब तमिलनाडु की तत्कालीन सीएम जयललिता और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के बीच ठन गई थी। उस वक्त जयललिता ने ममता की तरह ही तीन आईपीएस अधिकारियों को नई दिल्ली भेजने से इनकार कर दिया था। आखिर में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) ने जयललिता के पक्ष में फैसला सुनाया था। जानिए क्या था पूरा मामला-पश्चिम बंगाल में जेपी नड्डा के काफिले पर हुए हमले के बाद से राजनीति गरमाई हुई है। इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दे रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भेजने का आदेश जारी किया था। ये अधिकारी जेपी नड्डा के दौरे के सुरक्षा के प्रभारी थे हालांकि ममता सरकार ने अधिकारियों की कमी का हवाला देते हुए केंद्र प्रतिनियुक्ति पर भेजने से इनकार कर दिया है। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अधिकारियों को लेकर तनातनी की खबरें कोई नई नहीं है। कुछ ऐसा ही 2001 में भी हुआ था। जानिए क्या है पूरा मामला-

केंद्र सरकार और ममता बनर्जी एक बार फिर आमने-सामने हैं। इस बार ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने से इनकार कर दिया है। ऐसा ही कुछ 2001 में भी हुआ था जब तमिलनाडु की तत्कालीन सीएम जयललिता और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के बीच ठन गई थी। उस वक्त जयललिता ने ममता की तरह ही तीन आईपीएस अधिकारियों को नई दिल्ली भेजने से इनकार कर दिया था। आखिर में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) ने जयललिता के पक्ष में फैसला सुनाया था। जानिए क्या था पूरा मामला-
ममता और गृह-मंत्रालय आमने-सामने

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हुए हमले के बाद से ममता और केंद्र सरकार के बीच जंग चल रही है। गृह मंत्रालय नड्डा के काफिले की सुरक्षा के प्रभारी तीन आईपीएस अधिकारियों को समन भेजकर प्रतिनियुक्ति पर नई दिल्ली बुलाया है लेकिन ममता बनर्जी ने केंद्र को साफ इनकार कर दिया है। ये अधिकारी राजीव मिश्रा (अतिरिक्त महानिदेशक, दक्षिण बंगाल), प्रवीण त्रिपाठी (उप महानिरीक्षक, प्रेसीडेंसी रेंज) और भोलानाथ पांडे (एसपी, डायमंड हार्बर) हैं।
तब तमिलनाडु के तीन IPS अफसरों को दिल्ली बुलाया गया था

कुछ ऐसा ही टक्कर अगस्त 2001 में देखने को मिली थी। तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच तकरार तीन आईपीएस अधिकारियों के तबादले को लेकर थी। केंद्र इन अधिकारियों को केंद्रीय सचिवालय में नए पद पर तैनात करना चाहता था। ये तीन अधिकारी थे-चेन्नै पुलिस कमिश्नर के मुथुकरुप्पन, जॉइंट कमिश्नर (सेंट्रल) एस जॉर्ज और डेप्युटी कमिश्नर (त्रिपिलिकेन) क्रिस्टोफर नेल्सन।
(तस्वीर- एस जॉर्ज और मुथुरुकरुप्पन)
जयललिता ने कर दिया था इनकार

तब जयललिता ने आईपीएस अधिकारियों को दिल्ली भेजने से इनकार कर दिया था। इतना ही नहीं जयललिता ने दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अधिकारों की रक्षा के लिए चिट्ठी भी लिखी थी। उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्र-राज्य संबंधों में परेशान करने वाली प्रवृत्ति के बारे में लिखा था।
करुणानिधि की गिरफ्तारी और बौखला गई थी डीएमके

इस पूरे विवाद की जड़ उसी साल जयललिता के सीएम पद की शपथ लेने के बाद शुरू हुई थी। सीएम बनने के बाद 29-30 2001 जून की रात तमिलनाडु पुलिस की सीबी-सीआईडी ने पूर्व सीएम करुणानिधि के घर छापा मारा और उन्हें जबरन उठाकर अपने साथ ले गई। उस वक्त केंद्र में मंत्री मुरासोली मारन और टीआर बालू को भी गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों अटल सरकार में मंत्री थे।
आडवाणी ने तीनों अधिकारी को दिल्ली तलब किया

छापे में शामिल तीन आईपीएस अधिकारी की पहचान की गई। कहा जाता है कि करुणानिधि की जबरन गिरफ्तारी पर डीएमके आगबबूला हो गई थी और तब तमिलनाडु में विपक्षी दल और केंद्र में सहयोगी डीएमके के दबाव में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने तीनों अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली बुला लिया था।
कैट ने अधिकारियों के तबादले पर लगाई थी रोक

बताया जाता है कि तीनों ने अपने तबादले के ऑर्डर को रद्द करने के लिए सेंट्रल ऐडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) में याचिका डाली थी। इसके जवाब में 7 अगस्त को कैट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेजा था। अडिशनल सॉलिसिटर जनरल वीटी गोपालन के उस वक्त कहा था कि पहले राज्य को अधिकारियों के मुक्त करने का ऑर्डर देना होगा, उसके बाद ही केंद्र कैट के पास आ सकता है।
अधिकारियों पर ऐक्शन को लेकर क्या कहता है नियम?

अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) , 1969 के नियम 7 के मुताबिक, राज्य सरकार के अधीन तैनात सिविल सेवा अधिकारियो के खिलाफ केंद्र कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है। अगर अधिकारी राज्य के अधीन अपनी सेवा दे रहा है तो प्राधिकरण कार्यवाही और जुर्माने का अधिकार राज्य के पास होगा। वहीं अगर किसी एक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होनी है तो उसके लिए केंद्र और राज्य दोनों की सहमति की आवश्यकता है। भारतीय पुलिस सेवा (कैडर) नियम, 1954 के नियम 6 (1) के मुताबिक, किसी भी तरह की असहमति होने पर राज्य को केंद्र के लिए फैसले को मानना होगा।
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