लखनऊ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने कासगंज में अपनी पहली जन विश्वास रैली में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (Kalayn Singh) की विरासत का जिक्र किया। कासगंज कल्याण सिंह की कर्मभूमि थी और यहां पिछड़ी जातियों का वर्चस्व है। अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि कल्याण सिंह के मार्गदर्शन के बिना 2014, 2017 और 2019 के चुनाव जीतना असंभव होता। कासंगज में अमित शाह ने अपने संबोधन की शुरुआत और अंत, दोनों बाबूजी यानी कल्याण सिंह के नाम से की। इसके पीछे की सियासी गणित क्या है? पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह वर्ष 1993 में कासगंज और अतरौली से विधानसभा चुनाव जीते थे। 2009 लोकसभा चुनाव में कासगंज-एटा सीट से वे बतौर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़े और जीते। इस क्षेत्र से उनका लगाव हमेशा रहा। रविवार को पूरे शहर में अमित शाह और कल्याण सिंह की फोटो वाले होर्डिंग देखे गये। गृहमंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन की शुरुआत में ही उनका नाम लेकर कहा कि बाबूजी के निधन के बाद पहली बार कासगंज आया हूं। यह उनकी कर्मभूमि है। उन्होंने राममंदिर के लिए उत्तर प्रदेश जैसे राज्य की कुर्सी की भी चिंता नहीं की। भाषण के समापन में भी उन्होंने कल्याण सिंह का स्मरण कर 300 पार का संकल्प दिलवाया और ब्रज से सपा का सूपड़ा साफ करने का आह्वान किया। अमित शाह ने क्या कहा रविवार को यूपी के कासगंज में एक रैली को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ही पहले शख्स थे जिन्होंने पहली बार प्रदेश में पिछड़ी जातियों की बात की थी। दिवंगत कल्याण सिंह के लिए बाबूजी का संबोधन करते हुए शाह ने कहा कि यही कारण रहा कि पिछड़ी जातियों में उनका वर्चस्व रहा, इसे सिंह की 'कर्मभूमि' के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कहा कि सिंह के मार्गदर्शन के बिना 2014, 2017 और 2019 के चुनाव जीतना असंभव होता और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगातार चौथी जीत के लिए प्रेरणा बताया। जातिगत वोट बैंक पर निशाना पूरे ब्रज में कल्याण सिंह की मजबूत पकड़ रही है। वे लोध राजपूत जाति के थे। ब्रज जिलों में शाक्य और यादव जाति के साथ लोध राजपूतों की संख्या भी काफी ज्यादा है। ऐसे में अमित शाह ने कहीं ने कहीं यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कल्याण सिंह के बहाने लोध राजपूतों के वोट बैंक पर निशाना साधा है। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वस्त से पहले सीएम के रूप में कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए राम मंदिर आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई थी। ऐसे में यूपी चुनाव से पहले कल्याण सिंह का जिक्र करके अमित शाह ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। हिंदुत्व के साथ ओबीसी की गणित1980 के दौर में कल्याण सिंह यूपी में ओबीसी का बड़ा चेहरा बन गये थे। बीजेपी में सबसे पहले पिछड़ों की राजनीति के साथ हिंदुत्व का प्रतीक कल्याण सिंह ही थे। पिछड़ों की राजनीति हावी थी। मुलायम सिंह को टक्कर देने वाले कोई था तो कल्याण सिंह ही थे। मुलायम की राजनीति को ब्रेक लगाने का काम कल्याण करते थे। कल्याण सिंह ने गैर यादव ओबीसी को भाजपा से जोड़ा। भाजपा जब 1991 में सत्ता में आई और कल्यण सिंह सीएम बने। तब उन्होने अपने कैबिनेट में ओबीसी को बराबर की हिस्सेदारी दी। ऐसे में अमित शाह और बीजेपी उनके नाम सके सहारे ओबीसी वोटबैंक पर भी निशाना साधने की कोशिश की है। भावुक हुए केशव प्रसाद केंद्रीय गृहमंत्री के संबोधन से पहले उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की जुबां पर भी कल्याण सिंह रहे। उन्होंने कासगंज को पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की कर्मभूमि बताई और पूर्व मुख्यमंत्री को यादकर भावुक दिखाई दिए। कहा कि राम मंदिर का सपना साकार करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के निधन पर पूरा देश शोक में डूबा। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए जन सैलाब उमड़ा, लेकिन सपा मुखिया अखिलेश यादव ने उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दी। से जुड़ी हर खबर के लिए एनबीटी ऑनलाइन से जुड़े रहेंदेश में सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। इस बार उत्तर प्रदेश में 403 सीटों वाली 18वीं विधानसभा के लिए ये चुनाव होना है। बता दें 17वीं विधानसभा का कार्यकाल 15 मई तक है। 17वीं विधानसभा के लिए 403 सीटों पर चुनाव 11 फरवरी से 8 मार्च 2017 तक 7 चरणों में हुए थे। इनमें लगभग 61 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इनमें 63 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं थीं, जबकि पुरुषों का प्रतिशत करीब 60 फीसदी रहा। चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें जीतकर पहली बार यूपी विधानसभा में तीन चौथाई बहुमत हासिल किया। वहीं अखिलेश यादव की अगुवाई में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन 54 सीटें जीत सका। इसके अलावा प्रदेश में कई बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती की बीएसपी 19 सीटों पर सिमट गई।
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