नई दिल्ली वीर सावरकर पर चर्चा नई नहीं है। अक्सर उनकी बात होती है। हिंदुत्व की उनकी विचारधारा पर विपक्ष जब-तब निशाना साधता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने फिर उनका जिक्र किया है। उन्होंने कहा है कि वीर सावरकर को बदनाम करने वाले अभी और आगे बढ़ेंगे। अभी कई और विभूतियों को बदनाम करने की साजिश की जाएगी। इनमें स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और योगी अरविंद शामिल हैं। भागवत वीर सावरकर पर एक पुस्तक विमोचन में पहुंचे थे। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कई अहम बातें कहीं। किसी प्रोग्राम में भागवत पहुंचे और हिंदुत्व की चर्चा न हो यह भला कैसे संभव हो सकता है। मंगलवार को भी यही हुआ। आरएसएस चीफ बोले कि सावरकर राष्ट्रवादी और दूरदर्शी थे। उन्होंने जो कुछ कहा था सच हुआ। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सावरकर युग है। यह युग देशभक्ति का है। यह कर्तव्य और भागीदारी को सिखाने वाला युग है। भागवत ने कहा कि हिंदुत्व सिर्फ हिंदुत्व है। सावरकर जी का हिंदुत्व, विवेकानंद का हिंदुत्व ऐसा बोलने का फैशन हो गया है। हिंदुत्व एक ही है। वो पहले से है। आखिर तक वो ही रहेगा। सावरकर ने परिस्थिति को देखकर इसका उद्घोष जोर से करना जरूरी समझा था। वह बोले कि सावरकर को बदनाम करने की मुहिम चलाई गई। अब विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और योगी अरविंद के साथ भी यही करने की कोशिश की जाएगी। कारण है कि सावरकर इन तीनों के विचारों से प्रभावित थे। सावरकर पर होते हैं किस तरह के हमले? विपक्ष खासतौर से कांग्रेस के कई नेता सावरकर की वीरता पर सवाल उठाते रहे हैं। वो कहते रहे हैं कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी। माफी मांगने वाला भला कैसे वीर हो सकता है। वहीं, संघ उन्हें भारत माता का सच्चा सपूत मानता है। उन्हें दो बार उम्र कैद की सजा हुई। उसी दौरान वह आरएसएस संस्थापक डॉ हेडगेवार के संपर्क में आए। आजादी के बाद सावरकर ने हिंदू समाज की उन्नति के लिए काम करना शुरू कर दिया। आमरण अनशन करते हुए उन्होंने 26 फरवरी 1966 में अंतिम सांस ली। भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में सावरकर का नाम महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र जैसे महानायकों के साथ लिया जाता है। स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, योगी अरविंद... स्वामी विवेकानंद , दयानंद सरस्वती और योगी अरविंद इन तीनों को हिंदुओं में चेतना और जागरूक करने का श्रेय जाता है। इन्होंने धार्मिक और सामाजिक पुनर्जागरण का काम किया था। इन सभी ने समाज में कुरीतियों और पाखंड को दूर किया। ये उस दौर के रूढ़िवादी हिंदुओं के निशाने पर भी रहे थे। आधुनिक युग के चिंतकों में इन तीनों को काफी ऊंचा दर्जा मिला हुआ है।
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