तलवारबाज भवानी को आई पिता की याद, पीएम मोदी बोले- तुम झांसी की रानी हो बेटा

नई दिल्ली वैसे तो तलवारबाजी हिंदुस्तान के वीरों और वीरंगनाओं की शौर्यगाथाओं का हिस्सा रही है, लेकिन खेल के रूप में इसे पहचान सीए भवानी देवी ने दिया। वही भवानी देवी जिन्होंने भारतीय ओलिंपिक इतिहास में एक नए अध्याय का आगाज किया। तोक्यो ओलिंपिक के लिए फेंसिंग में क्वालीफाई करने वाली देश की पहली तलवारबाज बनी। दूसरे दौर में भले ही हार गई, लेकिन देश का दिल जीत लिया। मोदी को देख आई पिता की याद चेन्नई की रहने वाली भवानी देवी 27 साल की हैं। पीएम मोदी ने 16 अगस्त को तोक्यो ओलिंपिक के भारतीय दल को विशेष रूप से आमंत्रित किया था। इस दौरान भवानी ने पीएम मोदी से मुलाकात की। दो तस्वीर ट्वीट करते हुए अपने मन की बात सोशल मीडिया पर बयां की। भवानी ने अपने पिता को याद किया, 'आप और क्या चाहेंगे? मैंने हाल ही में अपने पिता को खोया। अब माननीय प्रधानमंत्री के शब्द और आशीर्वाद ने मुझे उनकी याद दिला दी। पीएम ने कहा झांसी की रानी 'भारत का झंडा पहली बार तलवारबाजी जैसे नए खेल में क्वालीफाई करना आसान नहीं है, आपने देश के लिए एक नया खेल पेश किया है और हम सभी को गौरवान्वित किया है। आपकी उपलब्धियों ने पूरे देश के युवाओं और बच्चों को खेल में शामिल होने के लिए प्रेरित किया है और तुम झांसी की रानी जैसी हो बेटा'। पीएम मोदी से हुई बातचीत को भवानी से इस अंदाज में ट्वीट किया। कैसे खेली जाती है फेंसिंग तलवारबाजी के खेल को अंग्रेजी में फेंसिंग कहते हैं। इस खेल में दो प्रतियोगी हाथों में तलवार लेकर एक दूसरे के शरीर पर प्रहार करने की कोशिश करते हैं। शरीर के कुछ तय अंग होते हैं, जिन पर हमला किया जा सकता है। इसके तीनों प्रारूपों के लिए अलग अलग नियम होते हैं। ओलिंपिक में पुरुष और महिला वर्ग में व्यक्तिगत फॉएल, व्यक्तिगत एपे, व्यक्तिगत सेबर तथा इन तीनों प्रारूपों की दोनों वर्गों में टीम स्पर्धाएं शामिल हैं। 1896 से ओलिंपिक का हिस्साओलिंपिक तलवारबाजी में यूरोपीय देशों का दबदबा रहा है। ओलिंपिक में 1896 एथेंस ओलिंपिक में ही तलवारबाजी को शामिल कर दिया गया था और तब से वह इन खेलों का हिस्सा बना हुआ है। महिला तलवारबाजी 1924 में पेरिस ओलिंपिक में शामिल की गई थी। महिलाएं पहले फॉएल में भाग लेती थी, लेकिन अटलांटा ओलिंपिक 1996 से उन्होंने एपे और एथेन्स 2004 से सेबर में हिस्सा लेना शुरू किया था। मां को बेचने पड़े थे गहने भवानी का इस खेल में आना एक दिलचस्प किस्से का हिस्सा है। 11 साल की भवानी पढ़ाई से बचना चाहती थीं। उनकी कक्षा में सभी को अपनी पसंद के खेल चुनने थे, लेकिन तब उनका नंबर आया तो इस खेल में किसी ने अपना नाम नहीं लिखवाया था। 2004 से हुई शुरुआत के बाद इस खेल से लगाव धीरे धीरे बढ़ता रहा। मध्यम वर्ग परिवार से ताल्लुक रखने वाली आठ बार की राष्ट्रीय चैंपियन भवानी ने इस खेल के खर्चे को देखते हुए एक बार इसे छोड़ने का भी मन बना लिया था क्योंकि इसके लिए पहने जाने वाला विशेष तरह का सूट ही काफी महंगा होता है और उनकी माँ को उनके लिए अपने गहने तक बेचने पड़ गए थे।


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