नई दिल्ली निर्भया के दोषियों की दया याचिका सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति खारिज कर देते हैं तब भी फांसी पर लटकाने से पूर्व 14 दिनों का समय उन्हें दिया जाएगा। केस के चार गुनाहगारों में से एक अक्षय ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दाखिल की है। तिहाड़ जेल प्रशासन का कहना है कि दोषियों के पास दया याचिका दाखिल करने का वक्त अब खत्म हो गया है। रिव्यू पिटिशन खारिज करने के बाद भी चारों दोषियों को फांसी पर चढ़ाने से पहले कुछ वक्त मिल सकता है। क्यूरेटिव पिटिशन फाइल कर सकते हैं दोषी तिहाड़ जेल में इससे पहले संसद हमलों के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाया गया था। उस वक्त की परिस्थितियों से अलग निर्भया के दोषियों को मौत की सजा दिए जाने से पहले जेल प्रशासन सभी जरूरी नियमों का पालन कर सकता है। इस प्रक्रिया के तहत अगर राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर देते हैं तो भी दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल करने का मौका होगा, लेकिन याचिका को स्वीकार करने का फैसला कोर्ट पर निर्भर करता है। पढ़ें : मानसिक तौर पर तैयार होने के लिए मिलेगा 14 दिन दोषियों को अगर मौत की सजा से किसी तरह से राहत नहीं मिलती है तो भी उन्हें 14 दिन का वक्त मिलेगा। 14 दिन की यह अवधि फांसी की सजा पानेवाले शख्स को मानसिक तौर पर तैयार होने के लिए दी जाती है। इस दौरान दोषी व्यक्ति अपने परिवार से मुलाकात कर सकता है, अपनी वसीयत बना सकता है। तिहाड़ के जेलर सुनील ग्रोवर ने बताया, 'शत्रुघ्न चौहान द्वारा पूर्व में दाखिल की गई याचिका के बाद अब फांसी की सजा पाए शख्स को अंतिम सजा से पहले कुछ नियमों का पालन अनिवार्य है। फांसी से पहले दोषी के परिवार को लिखित में सूचना दी जाएगी साथ ही दोषी को मानसिक तौर पर तैयार होने का भी मौका मिलेगा।' परिवार को लिखित में सूचना देना अनिवार्य तिहाड़ जेल के जेलर सुनील गुप्ता ने इस नियम के तहत दोषियों को मिलनेवाली छूट का जिक्र किया। उन्होंने कहा, 'जेल नियम 2018 के अनुसार दोषी शख्स के साथ ही उसके परिवार को भी लिखित में सूचना देना अनिवार्य है। यह सूचना लाल रंग के लिफाफे में दी जाती है। 14 दिनों के समय के अंदर यह लिखित सूचना परिवार तक पहुंचनी चाहिए और उसकी रसीद जेल रजिस्टर में रेकॉर्ड के तौर पर रखी जाती है।' पढ़ें : निजी सामान को दोषी परिवार को सौंप सकते हैं जेल नियमों के अनुसार 14 दिन के समय में दोषी शख्स अपना निजी सामान परिवार को सौंप सकता है। यह प्रक्रिया जेल सुपरिटेंडेंट की निगरानी में ही पूरी होगी। इसके साथ ही दोषी शख्स को अकेले खुले स्थान पर जेल के अंदर शिफ्ट किया जाता है जहां दिन-रात वह वॉर्डन की ही निगरानी में रहता है। 14 दिन के समय में दोषी चाहे तो अपनी वसीयत बना सकता है।
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