हमले पर हमले... कृषि कानूनों की वापसी से कितना बढ़ेगा राहुल का राजनीतिक कद?

नई दिल्‍ली का ऐलान कई मायने में बेहद अहम है। इसने एक बेहद मजबूत सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया है। 2020 में कृषि कानून संसद से पास हुए थे। इनके पास होने के तुरंत बाद ही कांग्रेस के पूर्व अध्‍यक्ष ने इनका तीखा विरोध शुरू कर दिया था। सड़क से लेकर संसद तक उन्‍होंने बीजेपी पर इसे लेकर हमले पर हमले किए। मोदी सरकार पर इसका दबाव बना। कृषि कानूनों पर राहुल गांधी के विरोध को एक और नजरिये से देखने की जरूरत है। उन्‍होंने यह विरोध यह जाने बगैर किया कि इसमें विपक्ष के कौन से दल उनके साथ खड़े होंगे। यहां 2015 का जिक्र जरूरी है। तब विपक्ष के नेता ने अकेले ही सरकार पर भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। बाद में विपक्ष के दूसरे दल भी इस विरोध में शामिल हुए थे। सरकार के इन दोनों विवादित कदमों के खिलाफ माहौल बनाने में राहुल को अलग करके नहीं देखा जा सकता है। इन दोनों ही मामलों में सरकार को कदम पीछे लेने पड़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले से निश्चित रूप से राहुल गांधी और उनके समर्थकों का मनोबल बढ़ना चाहिए। इस विरोध को धार देने में राहुल शुरुआत से ही आक्रामक रहे हैं। कृषि कानून पर सरकार के कदम खींचते ही उन्‍होंने किसानों-मजदूरों के पक्ष में खुला पत्र लिख उन्‍हें बधाई दी। साथ ही पीएम को आगाह किया कि इस तरह का कदम दोबारा उठाने का वह दुस्‍साहस नहीं करें। विपक्षि‍यों में सबसे बुलंद दिखी आवाज कृषि आंदोलन के दौरान राहुल बातचीत में हमेशा यह कहते रहे कि केंद्र सरकार एक दिन इन कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर होगी। ट्रैक्‍टर चलाकर संसद पहुंचना हो या इस मुद्दे को लेकर संसद को न चलने देना, राहुल की आवाज विपक्षि‍यों में सबसे बुलंद दिखी। अलग-अलग मसलों को लेकर सरकार पर हमला करने में विपक्ष कभी साथ नहीं दिखा है या यूं कहें बंटा रहा है। लेकिन, राहुल गांधी ने तकरीबन हर मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। पिछले कुछ साल में वह लगातार आक्रामक होते गए हैं। सरकार पर धावा बोलने के लिए उन्‍होंने सोशल मीडिया का भी भरपूर इस्‍तेमाल किया है। राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को भी उठाया कृषि कानून ही नहीं, राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मसलों पर भी राहुल की बेबाकी देखने को मिली है। जहां चीन के आक्रामक तेवरों, राफेल डील और जम्‍मू-कश्‍मीर की स्थितियां संभालने जैसे मसलों पर विपक्ष ने फूंक-फूंककर टैक्‍ट‍िकल पॉलिटिक्‍स की। वहीं, राहुल ने खुलकर सरकार को हर मुद्दे पर जवाबदेह बनाया। यही नहीं, एसेट मोनेटाइजेशन के मुद्दे पर भी सरकार को घेरने और उस पर सवाल खड़े करने वालों में राहुल गांधी सबसे आगे दिखाई दिए। भारतीय क्षेत्र में चीन के कब्‍जे की रिपोर्टों के बाद राहुल के स्‍टैंड को बल मिला है। जबकि दूसरे विपक्षी नेता इस डर से इस मसले पर बोलने से हिचकते रह गए कि कहीं बीजेपी उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों का राजनीतिकरण करने की तोहमत न लगा दे। सरकार पर हमले पर हमले करने से कुछ और हुआ हो या नहीं, लेकिन राहुल ने विपक्ष के दूसरे नेताओं को पीछे जरूर छोड़ा है। उन्‍होंने अपनी पार्टी के उन नेताओं को भी जवाब दिया है जो राहुल की क्षमताओं पर सवाल खड़े करते रहे हैं। इस लिहाज से आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में यह देखना दिलचस्‍प होगा कि विपक्ष में उनकी स्‍वीकार्यता किस हद तक बढ़ी है।


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