नरसिम्हा राव पर हमला कांग्रेसियों के लिए गांधी परिवार को खुश करने का शॉर्टकट क्यों हैं?

नई दिल्ली (CWC) की बैठक में नेताओं के बीच इस बात की होड़ मची रही कि गांधी परिवार का मेरे जैसा वफादार और कोई नहीं। सोनिया गांधी और उनके पुत्र-पुत्रियों- राहुल और प्रियंका को खुश करने के लिए कांग्रेसियों ने अपनी-अपनी तरह से चालें चलीं और इस दौरान शॉर्टकर्ट्स भी अपनाए। इसी क्रम में किसी ने नेहरू की बड़ाई की तो किसी ने नरसिम्हा राव को नीचा दिखा दिया। गांधी परिवार को खुश करने का शॉर्टकर्ट ऐसा पहली बार नहीं है कि देश के काफी चर्चित प्रधानमंत्री रह चुके अपने ही दिग्गज नेता की कांग्रेसियों ने लानत-मलामत की हो। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कांग्रेसियों को पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर हमला करना गांधी परिवार को खुश करने का ट्राइड एंड टेस्टेड फॉर्म्युला क्यों जान पड़ता है? CWC मीटिंग का अबज नजारा यह सवाल अभी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि शनिवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पूर्व सांसद चिंता मोहन ने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कामों की तारीफ तो की ही, लगे हाथ नरसिम्हा राव का वफादारी पर भी उंगली उठा दी। आंध्र प्रदेश के तिरुपति से सांसद रहे मोहन ने दावा किया कि नरसिम्हा राव कांग्रेसी विचारधारा के प्रति वफादार नहीं थे। ध्यान रहे कि राव को सोनिया गांधी ने ही प्रधानमंत्री बनाया था और वो कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे। अब एक गंभीर सवाल उठता है कि सोनिया गांधी ने जिसे कभी प्रधानमंत्री बनाया हो, उन्हीं के 'चरित्र-हनन' से वो खुश कैसे होंगी और ऐसा करने वालों को वो अपना वफादार कैसे समझेंगी? सोनिया द्वारा नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री पद देना दोनों के रिश्ते का एक पहलू है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है जो काफी स्याह है जिसे सियासत के सबसे बदनूमा उदाहरणों में गिना जा सकता है। गाढ़े वक्त में सोनिया ने ली थी राव की राय बात वर्ष 1991 की है जब राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी के सामने यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया था कि वो राजनीति में आएं या सास और पति के बलिदानों के मद्देनजर इससे दूर ही रहें। उन पर कांग्रेस की कमान संभालने का दबाव बन रहा था। अग्रिम मोर्चे के कांग्रेसी नेता लगातार परिवार के दो-दो सदस्यों के बलिदानों की दुहाई दे रहे थे और देश के ताजा राजनीतिक हालात का हवाला देकर उनसे पार्टी का अध्यक्ष पद तुरंत संभालने की मिन्नतें कर रहे थे। तब सोनिया गांधी ने नरसिम्हा राव से राय मांगी। सोनिया ने राव को बनाया पीएम लेखक विनय सीतापति ने अपनी पुस्तक हाफ लायन (Half Lion) में दावा किया है कि चूंकि सोनिया गांधी ने राव से कहा था कि वो जो भी जवाब दें, यह सोचकर दें कि उनकी बेटी ने उनसे यह सवाल किया है। सीतापति के मुताबिक, राव ने सोनिया से कहा कि अगर वो उनकी बेटी के रूप में पूछ रही हैं तो उन्हें राजनीति में नहीं आना चाहिए। सोनिया ने राव की बात मानी भी और उन्होंने दिग्गज कांग्रेसियों के एक खेमे की मांग ठुकरा दी। सोनिया ने अपने लिए तो फैसला किया ही, कैप्टन सतीश शर्मा और पीएन हक्सर की सलाह पर अपने 'मेंटर' नरसिम्हा राव के भाग्य का भी फैसला कर दिया। राजीव की हत्या (21 मई, 1991) के ठीक एक महीने बाद 21 जून, 1991 को नरिसम्हा राव देश के 10वें प्रधानमंत्री बन गए। सोनिया को खुश रखने की हर मुमकिन कोशिश प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सोनिया गांधी से नजदीकियां बनाए रखीं। वो सोनिया गांधी को सप्ताह में दो बार फोन करते। साथ ही, राव ने हर हफ्ते सोनिया के घर 10 जनपथ जाने की रुटीन भी बना ली। इतना ही नहीं, राव ने सोनिया को साधे रखने के लिए राजीव गांधी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने का फैसला किया और उनके नाम पर बने राजीव गांधी फाउंडेशन को सरकार की तरफ से 100 करोड़ रुपये दिए। लेकिन, 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया गया तो सोनिया ने अपना पहला राजनीतिक बयान जारी किया। 10 जनपथ पर IB की आंखें सोनिया गांधी ने अपने बयान में बाबरी मस्जिद विध्वंस पर नाराजगी तो जताई, लेकिन प्रधानमंत्री पर कोई टिप्पणी नहीं की। फिर भी नरसिम्हा राव को सतर्क हो गए और 10 जनपथ आने-जाने वालों पर नजर रखने के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) को लगा दिया। दरअसल, राव को सोनिया पर नहीं, उनके दरबारियों पर संदेह था। वो इसलिए क्योंकि उसी वर्ष राव की अध्यक्षता में संपन्न हुए कांग्रेस के तिरुपति अधिवेशन के बाद कुछ नेताओं ने सोनिया गांधी का कान भरना शुरू कर दिया था। राव को इसकी भनक लग गई थी। आईबी ने भी अपनी रिपोर्ट में राव को बताया कि 7 से 14 दिसंबर के बीच अहमद पटेल, अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, दिग्विजय सिंह और माधव राव सिंधिया ने सोनिया के घर जाकर मुलाकात की। आईबी ने यह भी रिपोर्ट दी कि इन नेताओं ने सोनिया के सामने इस बात पर नाराजगी प्रकट की कि बाबरी विध्वंस पर बतौर प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की भूमिका उचित नहीं रही। अब राव को सोनिया को लेकर भी सतर्क रहने लगे। फिर भी उन्होंने सोनिया को सप्ताह में दो बार फोन करने और एक बार घर जाकर बात करने का सिलसिला जारी रखा। लेकिन, 1993 का मध्य आते-आते जब सोनिया गांधी फोन उठाने में देर करने लगीं तो राव थोड़े मायूस होने लगे। सीतपति ने अपनी किताब में दावा किया है कि राव ने अपने सचिव पीवीआरके प्रसाद से कहा कि उन्हें तो बुरा नहीं लगता है, लेकिन प्रधानमंत्री को बुरा जरूर लगता है। इधर, राव के मन में सोनिया के साथ रिश्तों को लेकर उहापोह चल रहा था, उधर विपक्ष यह कहकर हमले करने लगा कि आखिर प्रधानमंत्री एक आम नागरिक को रिपोर्ट क्यों करते हैं? ध्यान रहे कि तब सोनिया गांधी किसी संवैधानिक पद पर नहीं थीं। ...और बढ़ गई तल्खी एक तरफ सोनिया से मायूसी, दूसरी तरफ विपक्ष के हमलों से एक कमजोर प्रधानमंत्री की छवि बनने के डर ने राव का कदम बदल दिया। अब उन्होंने 10 जनपथ जाना छोड़ दिया। ऐसे में सोनिया के कान भरने वालों की लॉटरी लग गई। तिवारी, सिंह, पटेल जैसे नेताओं की मंडली सोनिया को राव के खिलाफ भड़काने लगी जबकि सोनिया के पास राव का पक्ष रखने वाला कोई नहीं रहा। ऐसी परिस्थिति में सोनिया गांधी के मन में राव के प्रति कटुता बढ़ती गई जिसे मंडली ने यह कहकर हवा दी कि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तो राजीव गांधी हत्या कांड की जांच भी तेजी से नहीं होने दे रहे हैं। सोनिया पर इसका असर भी दिख गया। उन्होंने 20 अगस्त, 1995 को उत्तर प्रदेश के अमेठी में 10 हजार लोगों की सभा में कहा कि राजीव गांधी की हत्या के चार साल तीन महीने बीत जाने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी। उनके मुंह के राजीव हत्या कांड की जांच धीमी होने की बात निकलते ही 'राव हटाओ, सोनिया लाओ' के नारे गूंजने लगे। राव को लगने लगा कि पीएम पद से उनकी विदाई का वक्त आ गया है। उन्हें पता था कि सोनिया गांधी की कृपा जिस दिन हटी, वो प्रधानमंत्री की कुर्सी से हट जाएंगे। इस डर के मारे उन्होंने फिर से आईबी को काम पर लगा दिया। सोनिया और राव के बीच तल्खियां उरूज पर पहुंच गईं। निधन के बाद भी नहीं मिला सम्मान नतीजतन, 1999 के लोकसभा चुनाव में नरसिम्हा राव को टिकट नहीं मिला। उन्हें जब बीमारी ने घेरा तो कांग्रेसियों ने उनसे ऐसे मुंह मोड़ लिया, मानो वो पार्टी में अछूत हो गए हैं। शायद ही कोई कांग्रेसी 9 मोतीलाल नेहरू मार्ग के घर में पड़े राव का हाल-चाल लेने पहुंचता था। कांग्रेसियों ने यह दूरी राव से नहीं, उनकी लाश से भी बरती। वर्ष 2004 में जब नरिसम्हा राव का निधन हुआ तो उनका शव कांग्रेस मुख्यालय के अंदर लाने की अनुमति नहीं मिली, यहां तक कि उनका दाह-संस्कार भी दिल्ली में नहीं किया गया। विनय सीतापति लिखते हैं कि 23 दिसंबर, 2004 को राव ने एम्स में अंतिम सांस ली और उनका शव लेकर एयरफोर्स की गाड़ी 10 जनपथ के बाहर आधे घंटे खड़ी रही। जब दरवाजा नहीं खुला तो गाड़ी हवाई अड्डे की तरफ बढ़ गई। इससे पहले, निधन के बाद नेताओं के शवों को अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि के लिए कांग्रेस मुख्यालय में रखे जाने की परंपरा चली आ रही थी। जानकार बताते हैं कि जब राव का शव 10 जनपथ के बाहर था तब सोनिया अंदर थीं। जिस सोनिया गांधी ने कभी राव को पीएम बनाया था, वो नाराज हुईं तो 'उनका मरा हुआ मुंह भी नहीं देखा'। सोनिया का कमजोर नब्ज जानते हैं कांग्रेसी कांग्रेस नेताओं को यह प्रकरण पता है। वो इंसानी फितरत को समझते हैं, वो यह जानते हैं कि दुश्मन को भला-बुरा कहकर किसी को दोस्त बनाना पुराना शॉर्टकर्ट है। कांग्रेसी नेताओं ने सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में यही किया। उन्हें पता है कि गांधी परिवार की वफादारी साबित करके ही रुतबा बढ़ाया जा सकता है और इसके लिए सोनिया को जख्म को सहलाने से आसान तरीका भला और क्या हो सकता है।


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