नई दिल्ली को लेकर दाखिल याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के सामने यह मामला उठाया गया और कहा गया कि यह मामला बेहद महत्वपूर्ण है। लिहाजा, मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा था जिसमें याचिकाकर्ता ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए वेंकटचेल्लइया कमिशन की सिफारिश लागू करने की गुहार लगाई है। याचिका में कहा गया है कि दो बच्चों की नीति लागू की जाए। सरकारी सब्सिडी और नौकरी के लिए दो बच्चों की पॉलिसी लागू करने का निर्देश दिया जाए। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने एनबीटी को बताया कि मामले में पिछले साल 12 दिसंबर को केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल किया था। 22 फरवरी को मामले की सुनवाई हुई थी। इसके बाद से अभी तक मामला सुनवाई के लिए नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार के सामने गुहार लगाई गई है कि मामला महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की 50 फीसदी से ज्यादा समस्याओं की जड़ जनसंख्या विस्फोट है। जल संकट, जमीन की समस्या, रोटी कपड़ा और मकान की समस्या से लेकर गरीबी और कुपोषण हर समस्या का कारण जनसंख्या विस्फोट है। अस्पताल से लेकर स्कूलों में इसी कारण भीड़ है। ट्रैफिक जाम से लेकर गंभीर अपराध और हिंसा का कारण भी यही है। देश में केसों की पेंडेंसी में बढ़ोतरी से लेकर अनाज की कमी का कारण भी यही है। देखा जाए तो 50 फीसदी समस्याओं का कारण जनसंख्या बढ़ोतरी ही है ऐसे में यह मामला अहम है। लिहाजा मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाना चाहिए। क्या है याचिका? बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की ओर से अर्जी दाखिल कर भारत सरकार को प्रतिवादी बनाया गया है। कहा गया है कि देश में जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए कदम उठाए जाएं। देश में बढ़ती जनसंख्या के कारण ही क्राइम बढ़ रहा है और नौकरियों की कमी हो रही है। संशाधनों का अभाव हो रहा है। याचिका में गुहार लगाई गई है कि दो बच्चों की पॉलिसी घोषित की जाए। यानी सरकारी नौकरी, सब्सिडी आदि का क्राइटेरिया तय किया जाए। साथ ही कहा कि इस पॉलिसी का उल्लंघन करने वालों के कानूनी अधिकार, वोटिंग अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार ले लिया जाए। क्या है केंद्र सरकार का स्टैंड? सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के लोगों को परिवार नियोजन के तहत दो बच्चों की संख्या सीमित रखने के लिए मजबूर करने के वह खिलाफ है। कारण है कि इससे जनसंख्या के संदर्भ में विकृति पैदा होगी। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि लोगों को बच्चों की संख्या सीमित रखने के लिए सरकार दबाव नहीं डाल सकती। इससे डेमोग्राफिक विकृतियां पैदा होती हैं। परिवार नियोजन एक स्वैच्छिक नेचर का प्रोग्राम है। ये लोगों की इच्छा के हिसाब से फैमिली प्लानिंग की योजना है। इसके लिए कोई जोर जबर्दस्ती नहीं है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि पब्लिक हेल्थ राज्य का विषय है। हेल्थ से संबंधित तमाम गाइडलाइंस को लागू करने का अधिकार स्टेट का है।
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