IPC की धारा 124ए राजद्रोह से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

नई दिल्ली ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें आईपीसी की धारा-124 ए यानी राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता प्रभावित पक्षकार नहीं हैं और न ही राजद्रोह कानून को चुनौती देने के लिए उनका कोई मामला बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने उक्त टिप्पणी के साथ अर्जी खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई अर्जीसुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट आदित्य रंजन, वरुण ठाकुर और एक अन्य ने अर्जी दाखिल कर कहा था कि राजद्रोह कानून औपनिवेशिक काल का कानून है और ब्रिटिश ने भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए ये कानून बनाया था। महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया गया था। अब इस कानून का इस्तेमाल विचार अभिव्यक्ति के अधिकार को कुचलने के लिए किया जा रहा है। मौलिक अधिकारों का हननसुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में कहा गया था कि आईपीसी की धारा-124 ए के दुरुपयोग का मामला बढ़ा है। संवैधानिक लोकतंत्र और लोगों को मिले मौलिक अधिकार पर उसका डरावना प्रभाव पड़ रहा है। कानून का गलत तरीके से दुरुपयोग किया जा रहा है। जर्नलिस्टों, महिलाओं, बच्चों और स्टूडेंट्स के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल हो रहा है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कानून हुई व्याख्या की ये अवहेलना है। ब्रिटिश काल का औपनिवेशिक कानून देश में लोकतांत्रिक सिद्धांत का विकास हो रहा है और धारा-124ए औपनिवेशिक काल की निशानी के तौर पर अभी भी बरकरार है। आईपीसी की धारा-124 ए (राजद्रोह) ब्रिटिश काल का औपनिवेशिक कानून है। ये कानून ब्रिटिश राज के खिलाफ आवाज को कुचलने के लिए था जिसे लोकतंत्र में जारी रखने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। ये कानून अब अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट रहा है। जो सरकार में है अगर कोई उसकी नीति के विपरीत अभिव्यक्ति करता है तो 124 ए का प्रावधान उसकी अभिव्यक्ति का गला घोंट रहा है और इस तरह से जीवन और लिबर्टी के अधिकार को खतरा है।


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