हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से न देखें, राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दें मुस्लिम: मौलाना वहीदुद्दीन खान

प्रसिद्ध इस्लामी धर्म गुरु मौलाना को हाल ही में देश के दूसरे बड़े सम्मान से नवाजा गया है। मौलाना वहीदुद्दीन खान पारंपरिक इस्लामी ज्ञान में महारत रखने के साथ-साथ विज्ञान, इतिहास और सामाजिक विज्ञान के भी जानकार हैं। वे इस्लामी उसूलों को इन आधुनिक विषयों की रोशनी में भी परखने और उनकी समकालीन परिदृश्य में व्याख्या करने के लिए जाने-जाते हैं। सहिष्णुता, सह-अस्तित्व और अंतर-धार्मिक मेलजोल के जबर्दस्त हिमायती मौलाना वहीदुद्दीन खान से मोहम्मद शहजाद ने बात की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश: आपको आध्यात्मिकता के लिए पद्म विभूषण दिया गया है। आप इस्लामी रूहानियत को भारतीय अध्यात्म के साथ जोड़कर कैसे देखते हैं? किसी भी धर्म की जो स्पिरिट यानी रूह है, वह तो समान ही है। सब की भलाई, अच्छा व्यवहार, लोगों की मदद करना, इंसानियत, सामाजिक कार्य और खुदा से ताल्लुक। यही तो स्पिरिट है। दीन-धर्म के रूप अलग-अलग हैं, लेकिन रूह सब की एक ही है। खुदा को लोग जिस रूप में भी मान रहे हैं, उससे कनेक्शन होना चाहिए। सूफिज़म में भी यही है। इस्लाम और कुरान की इन्हीं तालीमात का मैं प्रचार-प्रसार करता हूं। आध्यात्मिक स्तर पर सारे मजहब एक ही हैं। आपकी आध्यात्मिक बातों में अमन-शांति का तत्व बहुत नुमायां होता है.. वह ख्वाब अभी तक मेरे जेहन में बाकी है, जिसमें मैंने गांधी जी को देखा था। मैं कहीं जा रहा था। मैंने देखा कि महात्मा गांधी सड़क पर अकेले बैठे हुए हैं। मैं उनके पास जाता हूं और खड़ा हो जाता हूं। कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने जेब से दो कलमें निकालीं और मुझे दीं। मेरे लिए यह इशारा काफी था। जाहिर है कि अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी का मुझे कलम देने के पीछे संदेश यही था कि मैं जो काम कर रहा हूं, उसे जारी रखूं। तो मैंने इस्लाम के अमन-चैन के पैगाम पर खूब कलम चलाई और आज भी मेरी यह कोशिश जारी है। सीपीएस की स्थापना का क्या मकसद था और उसको आज आप कहां देखते हैं? सेंटर फॉर पीस एंड स्पिरिचुऐलिटी (सीपीएस) की स्थापना 2001 में हुई थी। इसको 20 साल हो गए। उससे पहले इस्लामिक सेंटर और गुडवर्ड बुक्स की भी स्थापना की। इन सबके पीछे लक्ष्य एक ही रहा। इस्लामी साहित्य के जरिए मजहब के असल चेहरे को सामने लाना। साथ ही जेहाद और आतंकवाद के नाम पर जो इसकी छवि बिगाड़ी गई, या फिर अज्ञानता में लोगों ने इस पर हमले किए, उसका कुरान और हदीस की रोशनी में जवाब देना। इसके तहत दो सौ से ज्यादा किताबें लिखीं। कुरान का विभिन्न भाषाओं में आसान अनुवाद किया। यह कुरान भारत से लेकर न्यूजीलैंड तक, पूरी दुनिया में बांटी जा रही हैं। यह काम अब भी जारी है। साथ ही सीपीएस को आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया, वेबसाइट बनाई गई, किताबों को डिजिटल किया जा रहा है, लेक्चर सेशन की स्टूडियो में विडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग भी की जा रही है। खासकर कुरान के सेशन तो काफी हिट हैं। सीपीएस अब ग्लोबल हो चुका है। आप पर आरएसएस और बीजेपी का करीबी होने के आरोप लगते रहे हैं? मुझे तो राजीव गांधी सद्भावना अवॉर्ड भी दिया गया। तब किसी ने कांग्रेस का करीबी नहीं कहा। लोग पता नहीं कहां से यह शोशा ले आए कि मैं वाजपेयी हिमायत कमेटी के संस्थापकों में रहा। इस सिलसिले में कमेटी के सदस्य के तौर पर भी मेरे कोई हस्ताक्षर दिखा दे। कमेटी के लोगों के साथ किसी और काम से बैठना और उसका सदस्य होना, अलग-अलग बातें हैं। हां, मैं बातचीत का दामन कभी नहीं छोड़ता और ऐसा करके मैं उसव-ए-रसूल (पैगंबर का तरीका) पर अमल करता हूं। बातचीत से ही बड़े-बड़े मसले का हल निकलता है। आपने काफी पहले मुसलमानों को बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने की सलाह दी थी। अब जो फैसला आया, उस पर क्या कहेंगे? इस मामले में मेरा स्टैंड परिस्थितियों के हिसाब से रहा है। जब तक बाबरी मस्जिद ढहाई नहीं गई थी, तब तक मेरा मानना था कि हिंदुओं और मुसलमानों को यथास्थिति मान लेनी चाहिए। यह मैंने नरसिम्हा राव सरकार के उस कानून के हवाले से कहा था, जिसमें 1947 से पहले की इबादतगाहों की यथास्थिति बरकरार रखने की बात है। लेकिन जब विध्वंस हुआ, तब मेरी राय बदल गई और मैंने कहा कि अब झगड़ा खत्म करने के लिए मुसलमानों को दावा छोड़ देना चाहिए। फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मैंने मुसलमानों को सलाह दी कि जो फैसला आया, उसे कबूल करें। जो मिला उस पर शुक्र के साथ आगे बढ़ें और जो पीछे हो चुका, उसे भूल जाएं। आप तीन तलाक के विरोध में आवाज बुलंद करते रहे हैं। अब इस पर रोक से संतुष्ट हैं? कुरान के अनुसार तो एक साथ तीन तलाक है ही नहीं। लोग इसे खलीफा उमर से जोड़ते हैं, लेकिन असल में इसे बाद के उलेमा ने चलन में ला दिया। इस्लाम में खलीफा को उसके विवेक के अनुसार फैसला लेने का कुछ हक दिया गया है। खलीफा उमर ने विशेष परिस्थितियों में इसे मान्य करार दिया, तो यह वक्ती आदेश था। यह स्थायी थोड़े ही हो सकता है। लोगों ने इसे ही सबसे प्रचलित तरीका मान लिया। इसे खत्म होना ही चाहिए था। मौजूदा दौर में भारतीय मुसलमानों के लिए क्या सलाह देंगे? मुसलमानों को चाहिए कि राजनीति में चीजों को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से न देखें। सिर्फ राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखें और राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दें। इससे उनके खिलाफ जो बातें होंगी, वे अफवाह की तरह खत्म हो जाएंगी। दूसरे, भारतीय मुसलमानों के साथ-साथ पूरी दुनिया के मुसलमानों से मेरी गुजारिश है कि वे दिल से मान लें कि हमें हिंसा नहीं करनी, सिर्फ शांतिपूर्ण वार्ता से ही मसले का हल निकालना है। फिर देखिए चाहे कश्मीर का मसला हो या फिलिस्तीन का, खुद ही हल निकल आएगा।


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