सैल्यूटः साधन नहीं था फिर भी इन शख्सियतों ने साध ली सफलता, लहराया दुनिया में परचम

हाल में ही 2021 की फेमिना मिस इंडिया रनरअप चुनी गईं मान्या सिंह की कहानी किसी सपने के पूरा होने जैसी है। मुंबई में रहने वालीं मान्या के पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं तो उनकी मम्मी टेलर हैं। मान्या का अब तक का सफर संघर्षों से भरा हुआ रहा है। वह बेझिझक कहती हैं कि उन्होंने इयररिंग्स से लेकर जूतों तक जो कुछ पहना, सब दोस्तों ने दिया। मान्या जैसे कुछ और लोग भी हैं जिनकी कामयाबी ऐसे ही संघर्षों के रास्तों से होकर गुजरी है। समाज के लिए मिसाल बन चुकी ऐसी ही शख्सियतों की कहानी बता रहे हैं वीरेंद्र शर्मा और रजनी शर्मा....

Inspiring Stories of Successful Personality: हमारे समाज में ऐसी कई शख्सियतें मौजूद हैं जो अभावों से गुजरते हुए दुनिया पर अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे हैं। आज हम आपको ऐसे ही कुछ शख्सियतों के बारे में बताने जा रहे हैं...


सैल्यूटः साधन नहीं था फिर भी इन शख्सियतों ने साध ली सफलता, लहराया दुनिया में परचम

हाल में ही 2021 की फेमिना मिस इंडिया रनरअप चुनी गईं मान्या सिंह की कहानी किसी सपने के पूरा होने जैसी है। मुंबई में रहने वालीं मान्या के पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं तो उनकी मम्मी टेलर हैं। मान्या का अब तक का सफर संघर्षों से भरा हुआ रहा है। वह बेझिझक कहती हैं कि उन्होंने इयररिंग्स से लेकर जूतों तक जो कुछ पहना, सब दोस्तों ने दिया। मान्या जैसे कुछ और लोग भी हैं जिनकी कामयाबी ऐसे ही संघर्षों के रास्तों से होकर गुजरी है। समाज के लिए मिसाल बन चुकी ऐसी ही शख्सियतों की कहानी बता रहे हैं वीरेंद्र शर्मा और रजनी शर्मा....



'नंगे पैरों में पत्थर न चुभें इसलिए नदी किनारे दौड़ती थी'
'नंगे पैरों में पत्थर न चुभें इसलिए नदी किनारे दौड़ती थी'

एशियाड मेडलिस्ट एथलीट और अर्जुन अवॉर्डी दुती चंद ने बताया कि उन्हें साल 2020 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया है। आज उनके पास दौड़ने के लिए महंगे जूते हैं लेकिन दुती चंद कभी नदी किनारे प्रैक्टिस करती थीं क्योंकि उनके पास जूते नहीं थे। वह बताती हैं कि सड़क के मुकाबले नदी किनारे की जमीन नर्म लगती थी और पत्थर कम चुभते थे। पिताजी बुनकर हैं और 6 बहनों का परिवार जिसमें एक भाई है। ऐसे में दो वक्त का खाना सबको मिल जाए यही बड़ी बात थी। दौड़ने के लिए जूते मिलना या दूध व अच्छा खाना मिलना तो सिर्फ सपना था। रात के बचे चावल ही भाई-बहन सुबह भी खाते थे। दुती जब बड़ी बहन सरस्वती के साथ दौड़तीं तो पड़ोसी उनकी मां से कहते थे कि घर में खाना नहीं है और तुम लड़कियों से दौड़ लगवाओगी। दुती चंद ने 11 साल की उम्र में पहली बार दूध पीया था। उस वक्त एक रिश्तेदार ने उन्हें एक गाय बेची थी। वह बताती हैं कि घर में सबसे छोटे सदस्य को ही त्योहार पर नए कपड़े मिलते थे क्योंकि वही सबसे ज्यादा रोता था।

दौड़ जीती तो पहली बार जूते पहनने को मिले-

चौथी क्लास में दुती ने एक दौड़ प्रतियोगिता जीतने के बाद पहली बार जूते पहने थे। ये जूते उनकी बड़ी बहन सरस्वती ने लाकर दिए थे। बचपन में दुती को डाइट के नाम पर नॉनवेज में सिर्फ अंडा मिलता था। वह भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन, जिसके लिए मां पूरे हफ्ते पैसे बचाती थीं। इस तरह अपनी धावक बेटियों दुती और सरस्वती को 1-1 अंडा खिला पाती थीं।

मां की झोपड़ी अब तीन मंजिला घर है-

दुती बताती हैं कि गांव में अधिकांश लोगों के पक्के मकान थे और उनकी झोपड़ी। घर में इतनी ज्यादा गरीबी थी कि उन्होंने उसे दूर करने के लिए भाग्य बदलने की ठान ली। जिसके लिए उन्हें सिर्फ दौड़ना था, वह भी सबसे तेज। मां कहती थीं कि बड़ी होकर तुम ही घर बनवाओगी। अब दुती घर बना चुकी हैं। उन्होंने मां को तीन मंजिला घर बनाकर दिया है।



'रिक्शा चलाते थे पापा, मम्मी बागान में चाय पत्ती चुनतीं'
'रिक्शा चलाते थे पापा, मम्मी बागान में चाय पत्ती चुनतीं'

उबले चावल और आलू खाकर ऊंची कूद लगाती थी-

पश्चिम बंगाल की स्वप्ना बर्मन भारत की पहली खिलाड़ी हैं जिन्होंने हेप्टाथलान में स्वर्ण पदक जीता है। 2018 के जकार्ता एशियाड में दो दिन तक चली 7 स्पर्धाओं में उन्होंने 6026 अंक हासिल कर गोल्ड मेडल जीता। हेप्टाथलान में सात स्पर्धाएं ऊंची कूद, भाला फेंक, गोला फेंक, लंबी कूद, 100 मीटर, 200 मीटर और 800 मीटर दौड़ होती हैं। स्वप्ना के पिता रिक्शा चलाकर बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने का काम करते थे और मम्मी टी गार्डन में काम करतीं। चार भाई-बहनों में स्वप्ना सबसे छोटी हैं। उनके पिता उन्हें खेलों में इसलिए भेजना चाहते थे कि बेटी को सरकारी नौकरी मिल जाए। स्वप्ना दौड़ती थीं, ऊंची कूद में हिस्सा लेती थीं। मां उन्हें खेल के मैदान में छोड़कर आती थीं। स्वप्ना बताती हैं कि पापा इतना ही कमा पाते थे कि घर का खर्च चल जाए। ऐसे में खिलाड़ी जैसी डाइट कहां से मिलती। उबले चावल और आलू की सब्जी से ही अपनी डाइट पूरी करती थीं।

पैरों में 6 अंगुलियां हैं तो जूते नहीं मिलते थे-

स्वप्ना के सामने एक दिक्कत यह थी कि उनके दोनों पैरों में 6-6 अंगुलियां हैं। वह कहती हैं कि इस वजह से जो भी जूते पहनती, उसमें पैर बुरी तरह दर्द करते थे और बिना जूते प्रैक्टिस नहीं हो सकती। भयंकर दर्द के साथ ऊंची कूद की प्रैक्टिस करती। मेरे पैरों के नाप के जूते किसी दुकान में नहीं मिलते थे। स्वप्ना कहती हैं कि मैंने ही इसका रास्ता निकाला। पैर का साइज 4 नंबर था तो 5 नंबर का जूता पहनने लगी। इससे दर्द में थोड़ी राहत मिलने लगी। इसी तरह के जूते पहनकर स्वप्ना ने जकार्ता एशियाड में गोल्ड जीता।



'दंगल के बाहर लंगोट बेचते थे पापा, मम्मी सिलती थीं'
'दंगल के बाहर लंगोट बेचते थे पापा, मम्मी सिलती थीं'

खुराक कम मिलती थी पर मेहनत कम नहीं की-

रेसलर दिव्या काकरान पिता का सपना पूरा करने वाली हिम्मती लड़की हैं। वह बताती हैं कि पिता को पहलवान बनना था लेकिन वह अपना सपना पूरा नहीं कर पाए। मैं और मेरा भाई देव 10 साल की उम्र से पहलवानी करने लगे। लेकिन पैसों की किल्लत तो हमारे सामने भी थी। हालात यह थे कि मैं और मेरा भाई दोनों में से कोई एक ही पहलवानी जारी रख सकता था। भाई ने कुर्बानी दी और अखाड़ा छोड़ दिया। मैं मेहनत खूब करती लेकिन मुझे पूरी डाइट नहीं मिल पाती थी। सुबह-शाम एक गिलास दूध मिलता था। पहलवानी में अच्छी खुराक जरूरी होती है और यही मुझे नहीं मिल पाती थी। पर मैं कभी पापा से शिकायत नहीं करती थी। उनकी मजबूरी थी। वह दंगलों में जाकर लंगोट बेचते थे, मम्मी घर में बैठकर लंगोट सिलकर देती थीं। यही आमदनी का जरिया था।

जब लोग एनर्जी ड्रिंक लेते, मैं ओआरएस पीती थी-

जब कुश्ती के दौरान कुछ लोग ताकत के लिए एनर्जी ड्रिंक लेते थे तो मैं ग्लूकोन-डी या ओआरएस का घोल पीकर काम चलाती। 11 साल की उम्र में मैं पापा के साथ यूपी, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश में होने वाले इनामी दंगलों में जाने लगी। पापा वहां लंगोट बेचते थे और आयोजकों से कहते कि लड़कों से मेरी कुश्ती कराएं। पहले लोग लड़की होने की वजह से मना करते थे लेकिन बाद में तैयार होने लगे। लड़कों से दंगल लड़कर मैं कभी-कभी इनाम के 10 से 12 हजार रुपये घर ले आती। 14 साल की उम्र में भारत केसरी बन गई थी। लड़कों को कुश्ती में हराने पर भी मुझे ज्यादा इनाम मिलता था। कई बार मुझसे हारने के डर से लड़के आगे ही नहीं आते थे तो कई बार मुझसे तगड़े लड़के आगे आते, मैं उनसे भी भिड़ जाती थी। कई बार ऐसी कुश्ती हार गई लेकिन पैसा विनर से ज्यादा मिला। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। साल 2015 में एशियन चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए मैंने दंगल लड़ने छोड़ दिए। इसी दौरान पापा पर करीब 12 लाख रुपये का कर्ज हो गया। मम्मी के गहने भी गिरवी रखे हुए थे। तभी मैंने एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। जीत के पैसों से कर्ज कुछ कम हुआ।



'उन्हें लगा राजू कलेक्टर नहीं, कंडक्टर बन गया'
'उन्हें लगा राजू कलेक्टर नहीं, कंडक्टर बन गया'

देसी शराब के भट्टे पर काम करती थीं मां और दादी- IAS

अधिकारी राजेंद्र भारूड बताते हैं कि

मैं महाराष्ट्र के छोटे-से गांव में पला-बढ़ा हूं, भील आदिवासी समुदाय से हूं। मां और दादी महुआ के फूलों से देसी शराब बनाकर बेचती थीं। तब वहां आनेवाले लोग मुझे पढ़ने नहीं देते थे। लेकिन मुझे कभी उस बात का बुरा नहीं लगा। अब मैं सबको समझाता हूं कि शराब मत पिया करो। मुझे हमेशा मां का बहुत सपोर्ट मिला। मेरे पैदा होने से पहले ही पिताजी की मृत्यु हो गई। तब मां 3 महीने की प्रेग्नेंट थीं। लोगों ने कहा कि अबॉर्शन करा लो लेकिन वह नहीं मानीं। मैं नानी के छोटे-से घर में पैदा हुआ। उस वक्त इतनी गरीबी थी कि फोटो खिंचवाने के भी पैसे नहीं थे। इसलिए मुझे नहीं पता कि मेरे पिता कैसे दिखते थे। गांव में हमारी जेनरेशन पहली है जिसने पढ़ाई की। 10वीं करने के बाद बहन की शादी हो गई। भाई ने 12वीं तक पढ़ाई की। मुझे सब बहुत प्यार करते थे, खासकर मां ने बहुत संभालकर और मेहनत करके पढ़ाया। मेरे 10वीं में 95 पर्सेंट नंबर आए, 12वीं 90 पर्सेंट आए। मेडिकल एंट्रेंस में 97 पर्सेंट नंबर आए तो ओपन कोटा से मुंबई के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हो गया। साल 2011 तक एमबीबीएस कोर्स खत्म कर लिया। मुझे मेडिकल कॉलेज में बेस्ट स्टूडेंट का अवॉर्ड भी मिला। अगले एक साल में इंटर्नशिप खत्म हुई और उसी वक्त यूपीएससी की परीक्षा भी पास कर ली।

यूपीएससी के लिए 20 रुपये का फॉर्म भरना भी महंगा था-

12वीं 18 साल की उम्र में हुई और 23.5 साल में उम्र मैं आईएएस बन गया। मैं जिस महीने में डॉक्टर बना उसी महीने में यूपीएससी पास हो गया। यह तय था कि ज़िंदगी में जो कुछ करना है, आईएएस बनकर ही करना है। लेकिन मेरे लिए 20 रुपये खर्च करके यूपीएससी का फॉर्म भरना भी महंगा था। तब ऑनलाइन अप्लाई नहीं कर सकते थे। एक साथी के पास एक्स्ट्रा फॉर्म था तो मैंने भी भरकर जमा कर दिया। मार्च में फॉर्म भरा, मई में एग्जाम था। उस समय इंटर्नशिप के दौरान 8 घंटे तक काम करना पड़ता था। उसके बाद 6-7 घंटे पढ़ाई करते थे। पहली बार में ही प्रारंभिक परीक्षा पास हो गई। फिर मेंस परीक्षा, मेडिकल साइंस और पॉलिटिकल साइंस सब्जेक्ट के साथ। लेकिन मेरे पास डिग्री नहीं थी। इंटरव्यू तक पहुंच गया। तब एक ऑपरेशन भी करवाना पड़ा था, मैं पास हुआ लेकिन इंडियन रेवेन्यू सर्विसेज में चांस मिला। फरीदाबाद में मेरी ट्रेनिंग हुई। इसके बाद फिर आईएएस के लिए एग्जाम दिया क्योंकि जो पाना है उसके लिए कोशिश तो करनी ही है। 2012 में आईआरएस मिला था, साल 2013 में मैं आईएएस बन गया।

जब कलेक्टर बना तो गांव के दोस्त और घरवालों को लगा कि राजू कंडक्टर बन गया है।





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