लखनऊ के खिलाफ लड़ाई में यूपी आगे बढ़ा है। नीति आयोग के सर्वे के अनुसार ठिगनेपन, दुर्बलता और कम वजन से पीड़ित बच्चों की संख्या में कमी आई है। हालांकि अभी लंबी लड़ाई लड़नी है। प्रदेश में पांच साल की कम उम्र तक के 36.8 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत वजन से कम पाया गया है जबकि इस दौरान 12.4 फीसदी बच्चों का वजन गंभीर रूप से कम पाया गया है। कॉप्रेहेंसिव नैशनल न्यूट्रिशन सर्वे (सीएनएनएस) ने पहला सर्वे करवाया है, जिसमें प्री-स्कूल, स्कूल जाने वाले और किशारों के 1,12,316 बच्चों के पोषण का परीक्षण किया गया। यह सर्वे देश के 30 राज्यों में किया गया। इसमें अलग-अलग सूचकांकों पर यूपी में बच्चों के पोषण की स्थिति का जायजा लिया गया। पांच साल की उम्र के 38.8 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन से पीड़ित हैं। 2015-16 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के मुकाबले इसमें 7.5% कमी आई है। शहरी इलाके में 31.8 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन का शिकार शहरी इलाके में 31.8 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन का शिकार हैं जबकि ग्रामीण इलाके में यह आंकड़ा 40.10 प्रतिशत पहुंच जाता है। बच्चों की तुलना में बच्चियों में कुपोषण की वजह से नाटापन 0.7 प्रतिशत ज्यादा है। एनएफएचएस-4 में कम वजन वाले बच्चों की संख्या 39.5% थी जो अब 2.7% घटकर 36.8% हो गई है। अति दुर्बल बच्चों की संख्या भी 1.3% घटी है। 30 राज्यों के,12,316 बच्चों के पोषण का परीक्षण कुपोषण की एक और भयावह तस्वीर यह है कि प्रदेश में चार साल की उम्र तक के 43 फीसदी बच्चों में खून की कमी पाई गई है। यह बच्चे कुपोषण की वजह से एनिमिया से ग्रसित हैं। इनमें भी बच्चियों की स्थिति बच्चों को तुलना में खराब है। चार साल तक की उम्र के 23 फीसदी बच्चों में बी-12 की कमी पाई गई है।
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