नई दिल्ली राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने लद्दाख को जनजातीय क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की है। इसके पीछे सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र भी काम कर रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, लेह और करगिल की 80% और लद्दाख की 90% आबादी आदिवासियों की है। इस कारण इस केंद्रशासित प्रदेश को जनजातीय क्षेत्र का दर्जा पाने का हक मिलता है क्योंकि यहां से आधी से ज्यादा आबादी जनजातीय है। चूंकि लद्दाख में विधानसभा नहीं है, इसलिए यहां विधानसभा सीटों पर जनजातीय समुदाय को मिलने वाले आरक्षण जैसा प्रावधान यहां लागू नहीं हो पाएगा। ट्राइबल एरिया घोषित होने का महत्व ट्राइबल एरिया घोषित किए जाने पर लद्दाख को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को आवंटित केंद्रीय फंड का बड़ा हिस्सा मिलने लगेगा। राज्यों को आवंटित फंड सामान्य केंद्रीय सहायता (एनसीए) कहलाती है और इसका अनुपात 30:70 का होता है। एनसीए का 30 प्रतिशत हिस्सा 11 विशेष राज्यों को जाता है जबकि बाकी के राज्यों में शेष बचा 70 प्रतिशत फंड बांट दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, राज्यों में केंद्र सरकार की योजनाओं की 90% फंडिंग भी केंद्र ही करता है जबकि शेष 10% रकम राज्यों को बिना ब्याज के लोन के रूप में दिया जाता है। लद्दाख को क्या फायदा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने लद्दाख को ट्राइबल स्टेटस देने की सिफारिश की है, लेकिन उसने यह सिफारिश पांचवीं नहीं, बल्कि छठी अनुसूची के तहत किया है। पांचवीं अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को ट्राइबल एरिया घोषित किया गया है। ये राज्य जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अधीन आते हैं। वहीं, छठी अनुसूची के तहत उत्तर पूर्व के चार राज्यों को ट्राइबल एरिया का दर्जा हासिल है। ये राज्य गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं। लद्दाखी अपने लिए जनजातीय क्षेत्र का दर्जा इसलिए पाना चाहते हैं ताकि देश के दूसरे हिस्सों से लोग आकर वहां बस नहीं पाएं। ऐसे में उन्हें लद्दाख की जनसांख्यिकी (डिमॉग्रफी) बदलने का खतरा नहीं रहेगा। साथ ही, वहां की जमीन पर उनके विशेषाधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। दरअसल, लद्दाख 31 अक्टूबर से आधिकारिक तौर पर केंद्रशासित प्रदेश बन जाएगा, इसलिए देश के अन्य हिस्से में लागू कानून भी वहां लागू हो जाएंगे। ऐसे में लद्दाख में भी जमीन खरीदने का हक भी देशवासियों को मिल जाएगा। इसी से बचने के लिए लद्दाख ने खुद के लिए आदिवासी क्षेत्र दर्जे की मांग की है। लोकल अथॉरिटीज की बढ़ती है ताकत जनजातीय समुदायों को छठी अनुसूची के तहत कई तरह की स्वायत्तता प्राप्त हो जाती है। तब राज्यपाल की भूमिका और राज्य के विषयों को उचित सीमा तक विस्तार मिल जाती है। इससे दूसरे राज्यों की तुलना में यहां लोकल अथॉरिटीज को शासन की ज्यादा शक्ति प्राप्त होती है। छठी अनुसूची के तहत जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों के पास कानून बनाने की असली ताकत होती है। ये परिषदें विकास योजनाओं, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, सड़क और खुद में समाहित नियामकीय शक्तियों को लागू करने की लागत पूरी करने के लिए भारत की संचित निधि (कॉन्सोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया) से सहायता राशि स्वीकृत कर सकती हैं। लोकल अथॉरिटीज में शासन की शक्तियां समाहित करने का मकसद स्थानीय रीति-रिवाजों को सेहजना, बेहतर आर्थिक विकास और सबसे महत्वपूर्ण जनजातीय सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। फिर भिड़े भारतीय और चीनी सैनिक बहरहाल, पूर्वी लद्दाख में बुधवार को भारत और चीन के बीच सीमा पर बढ़ गया था। यहां दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे से उलझ गए थे। दोनों देश इस क्षेत्र में लगातार एक-दूसरे के आमने-सामने होते रहते हैं। चीन के पीएलए सैनिकों ने पिछले वर्ष लद्दाख के अंदरूनी हिस्से में घुसपैठ कर ली थी और भारतीय सीमा के अंदर टेंट गाड़ दिए थे। इस मुद्दे पर तनाव बढ़ा तो दोनों देशों के बीच ब्रिगेडियर लेवल की बातचीत हुई थी।
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